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168 परिवारों के रिश्ते टूटने से बचे ” महिला सहायता प्रकोष्ठ” टीम की बहुत बड़ी भूमिका

वाराणसी ब्यूरो

बदलते सामाजिक ताने-बाने ने परिवार की मजबूत डोर पर भी चोट की है | मामूली विवाद में रिश्तों के टूटने का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। ऐसे में शक, गलतफहमियां और संवादहीनता रिश्तों में आयी दरार को और भी बढ़ा देते हैं । ऐसे में परिवार के टूटने तक की नौबत आ पहुंचती है। ऐसे ही परिवारों को फिर से आमने-सामने बैठाकर उनकी गलतफहमियों को दूरकर फिर से रिश्ते की डोर को मजबूती देने में जुटा है महिला सहायता प्रकोष्ठ की टीम| कुछ इसी तरह के 168 परिवारों के रिश्तों को इस वर्ष टूटने से बचाया है वह भी महज कांउसलिंग के जरिए। इन सभी के सदिसुदा रिश्तों में हुए विवादों में नौबत तलाक तक आ पहुंची थी। वह किसी भी सूरत में एक-दूसरे के साथ रहने को तैयार नहीं थे दाम्पत्य जीवन में विवादों से अधिकतर महिलाएं शिकायत लेकर महिला सहायता टीम तक पहुंची शिवपुर की रहने वाली एक महिला की शिकायत थी कि उसके पति ने मारपीट कर घर से निकाल दिया है और वह अब उसे रखने को भी तैयार नहीं है। दोनों पक्षों को जब आमने-सामने बैठाया गया तो पता चला कि मामूली विवाद में नाराज होकर वह महिला दिल्ली में रहने वाली सहेली के यहां चली गयी थी। पति गुमशुदगी दर्ज करा कर उसे खोजने में परेशान था। पति का कहना था कि वह दिल्ली क्यों गयी जबकि उसका मायका पड़ोस में ही था। नाराजगी ही थी तो मायके भी जा सकती थी। दोनों पक्षों को समझा कर विवाद खत्म करा दिया गया। महिला अब अपने ससुराल में रह रही है और उसका परिवार टूटने से बच गया। गायघाट की रहने वाली एक महिला ने प्रकोष्ठ में शिकायत की थी कि उसके पति का किसी से प्रेम सम्बन्ध है जिसके कारण वह उसे प्रताड़ित करते हैं । जब दूसरे पक्ष की बात भी सुनी गयी तो पता चला कि विवाद की जड़ महिला का बार – बार मायके जाना है। समझाने पर पति-पत्नी मिलजुलकर रहने को तैयार हो गये। रामकटोरा की रहने वाली एक महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति घर का खर्च नहीं देते। पूरा पैसा नशे में उड़ा देते हैं । प्रकोष्ठ ने महिला के पति को बुलाया और तय कराया कि वेतन का एक हिस्सा घर के खर्च के लिए पत्नी को देगा। दोनों पक्षों को समझौता कराकर उन्हें घर भेज दिया। महिला सहायता प्रकोष्ठ की प्रभारी नीलम सिंह बताती हैं कि अमूमन हर रोज ही महिलाएं पारिवारिक विवादों को लेकर आती हैं। इनमें कुछ विवाद तो सीधे पति-पत्नी के बीच के होते हैं जबकि अधिकतर परिवार वालों द्वारा लगाये गये आरोप-प्रत्यारोप के चलते विकराल रूप ले चुके होते है। कुछ मामले शक या गलतफहमियों के चलते भी इस कदर बिगड़ चुके होते हैं कि परिवार बिखरने की स्थिति में होता है। नीलम सिंह बताती हैं कि शिकायत मिलने के बाद हमारा पहला प्रयास होता है कि मामले का निस्तारण आपसी सहमति से हो जाए। इसके लिए हम दोनों पक्षों को एक साथ बैठाते हैं । दोनों पक्षों की बातों को सुनने के बाद उनकी समस्या के समाधान का रास्ता उन्हें सुझाया जाता है। कांउसलिंग का यह नतीजा होता है कि अधिकतर मामलों में दोनों पक्ष सुलह-समझौते के लिए राजी हो जाते हैं और परिवार टूटने से बच जाता है। जब समझौते की सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं तभी हम ऐसे मामलों में मुकदमा दर्ज कराते हैं। अब तक 633 शिकायतें महिला सहायता प्रकोष्ठ में इस वर्ष अब तक कुल 633 शिकायतें प्राप्त हुई। इनमें 237 मामले पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन थे। 168 मामलों को सुलह-समझौते से सुलझा लिया गया जबकि दोनों पक्षों के राजी न होने पर 39 मामलों में मुकदमा दर्ज कराया गया। 189 ऐसे भी मामले रहे जिसमें शिकायतकर्ता शिकायत करने के बाद दोबारा नहीं आयी अथवा उसने कार्रवाई न करने की इच्छा जतायी।*संरक्षक की भी भूमिका -* महिला सहायता प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी केवल समझौता कराने तक ही सीमित नहीं है। वह समझौता करने वाली महिला के लिए ‘गार्जियन’ की भूमिका भी निभा रहा। इसके लिए प्रकोष्ठ ‘फीडबैक’ का भी नुस्खा आजमा रहा है । महिला सहायता प्रकोष्ठ की प्रभारी नीलम सिंह बताती हैं कि समझौते के बाद प्रकोष्ठ के लोग ऐसे सम्बन्धित परिवारों का फीडबैक भी लेते रहते हैं । शिकायत करने वाली महिला को भविष्य में कोई दिक्कत न हो इसका पूरा ध्यान रखा जाता है।

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